करण जौहर की फिल्म ‘कभी अलविदा ना कहना’ को रिलीज हुए 20 साल पूरे हो चुके हैं। साल 2006 में रिलीज हुई इस फिल्म ने उस दौर में रिश्तों, शादी और एक्स्ट्रा-मैरिटल रिलेशनशिप जैसे संवेदनशील विषयों पर कहानी पेश की थी। फिल्म में शाहरुख खान, रानी मुखर्जी, प्रीति जिंटा और अभिषेक बच्चन मुख्य भूमिकाओं में नजर आए थे। फिल्म की कहानी और किरदारों को लेकर उस समय काफी चर्चा हुई थी।
अब फिल्म के 20 साल पूरे होने पर करण जौहर ने इससे जुड़ी कई पुरानी यादें साझा की हैं। इसी दौरान उन्होंने यह भी बताया कि फिल्म की शूटिंग के समय शाहरुख खान अपने किरदार को लेकर काफी असमंजस में थे। उन्हें चिंता थी कि जिस तरह का किरदार वह निभा रहे हैं, उसे दर्शक पसंद करेंगे या नहीं।
शाहरुख खान को थी अपने किरदार को लेकर चिंता
‘कभी अलविदा ना कहना’ में शाहरुख खान ने देव सरन का किरदार निभाया था। देव एक फुटबॉल खिलाड़ी होता है, लेकिन एक दुर्घटना और पैर की चोट के बाद उसका खेल करियर प्रभावित हो जाता है। इसके बाद उसके व्यक्तित्व में गुस्सा, निराशा और कड़वाहट दिखाई देने लगती है।
फिल्म की कहानी आगे बढ़ने के साथ देव की मुलाकात रानी मुखर्जी के किरदार माया से होती है। दोनों अपनी-अपनी शादीशुदा जिंदगी से संतुष्ट नहीं होते और धीरे-धीरे एक-दूसरे के करीब आने लगते हैं।
यही वह हिस्सा था जिसे लेकर शाहरुख खान को अपने किरदार को निभाने में चुनौती महसूस हो रही थी। करण जौहर के अनुसार, शाहरुख ने उनसे सवाल किया था कि वह ऐसे किरदार को कैसे निभाएं जिसे देखकर दर्शकों को उससे जुड़ाव महसूस हो।
शाहरुख की चिंता मूल रूप से यही थी कि दर्शक उनके किरदार की खामियों के बावजूद उन्हें स्वीकार करेंगे या नहीं।
करण जौहर ने शाहरुख खान को क्या जवाब दिया?
करण जौहर ने शाहरुख खान की इस चिंता का जवाब उनके स्टारडम और दर्शकों के साथ उनके लंबे जुड़ाव को ध्यान में रखते हुए दिया।
करण ने उन्हें समझाया कि शाहरुख खान का स्क्रीन पर व्यक्तित्व ही ऐसा है कि दर्शकों के लिए उन्हें पसंद करना स्वाभाविक है। इसलिए चुनौती सिर्फ किरदार को ‘अच्छा’ दिखाने की नहीं, बल्कि उसके जटिल और कमजोर पक्षों को ईमानदारी से पर्दे पर दिखाने की थी।
करण जौहर ने बाद में यह भी माना कि फिल्म के दोनों प्रमुख किरदार बेहद जटिल थे और उनमें कई कमियां थीं। यही वजह थी कि उस समय उन्हें खुद भी अंदाजा नहीं था कि दर्शक इस रिश्ते और इन किरदारों को किस तरह स्वीकार करेंगे।
काजोल ने क्यों नहीं निभाया था माया का किरदार?
फिल्म से जुड़ी चर्चाओं में यह बात भी सामने आती रही है कि माया का किरदार पहले काजोल को ऑफर किया गया था, लेकिन उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया। बाद में यह भूमिका रानी मुखर्जी ने निभाई।
रानी मुखर्जी ने फिल्म में माया का किरदार निभाया, जबकि प्रीति जिंटा ने रिया और अभिषेक बच्चन ने ऋषि की भूमिका निभाई। फिल्म में चारों किरदारों के रिश्तों और उनकी भावनात्मक उलझनों को कहानी का अहम हिस्सा बनाया गया था।
करण जौहर के लिए भी आसान नहीं थी ‘कभी अलविदा ना कहना’
शाहरुख खान ही नहीं, बल्कि करण जौहर के लिए भी ‘कभी अलविदा ना कहना’ एक बड़ा रचनात्मक जोखिम था।
करण जौहर की शुरुआती फिल्मों की पहचान पारिवारिक रिश्तों, रोमांस और भावनात्मक कहानियों से रही थी। ऐसे में शादीशुदा लोगों के बीच विवाह के बाहर बनने वाले रिश्ते को केंद्र में रखकर फिल्म बनाना उनके लिए बिल्कुल अलग तरह की कहानी थी।
फिल्म 11 अगस्त 2006 को रिलीज हुई थी। इसकी कहानी शादी, प्यार, असंतोष और रिश्तों की जटिलताओं को लेकर थी। रिलीज के बाद फिल्म को लेकर दर्शकों की प्रतिक्रियाएं भी अलग-अलग रहीं।
रिलीज से पहले ही करण जौहर को सताने लगा था डर
फिल्म की रिलीज से ठीक पहले करण जौहर ने एक पेड प्रीव्यू के दौरान दर्शकों के बीच बैठकर फिल्म देखने का फैसला किया था। उन्होंने बाद में बताया कि उस दौरान उन्होंने दर्शकों की प्रतिक्रियाओं को बेहद करीब से देखा।
एक सीन के दौरान, जब देव और माया अपने रिश्ते को आगे बढ़ाते हैं, तब वहां मौजूद एक दंपति की प्रतिक्रिया काफी तीखी थी। करण ने बताया कि उस अनुभव ने उन्हें अंदाजा दे दिया था कि फिल्म का विषय दर्शकों के लिए कितना संवेदनशील हो सकता है।
फिल्म रिलीज होने के बाद भी इसे लेकर प्रतिक्रियाएं बंटी रहीं। कुछ लोगों ने इसे रिश्तों की जटिलता पर बनी कहानी के तौर पर देखा, जबकि कुछ दर्शकों ने विवाहेतर संबंधों के चित्रण पर सवाल उठाए।
करण जौहर ने 20 साल बाद क्या कहा?
फिल्म के 20 साल पूरे होने पर करण जौहर ने पीछे मुड़कर ‘कभी अलविदा ना कहना’ को याद किया। उन्होंने फिल्म की कमियों को भी स्वीकार किया और कहा कि फिल्म का स्तर और स्केल काफी बड़ा था तथा कुछ गाने ऐसे थे जिन्हें आज के नजरिए से वह जरूरी नहीं मानते।
साथ ही करण ने यह स्पष्ट किया कि फिल्म का उद्देश्य बेवफाई को बढ़ावा देना नहीं था। उनके अनुसार, कहानी का मकसद रिश्तों की जटिलताओं और उन फैसलों के परिणामों को सामने रखना था, जो किसी व्यक्ति की शादी और परिवार को प्रभावित कर सकते हैं।
20 साल बाद भी क्यों चर्चा में है KANK?
‘कभी अलविदा ना कहना’ उन फिल्मों में शामिल है जिन पर रिलीज के काफी समय बाद भी चर्चा होती रही है। इसकी वजह केवल शाहरुख खान और रानी मुखर्जी की जोड़ी नहीं, बल्कि फिल्म का विषय भी है।
फिल्म ने उस समय हिंदी सिनेमा में शादी और रिश्तों को लेकर एक असहज सवाल उठाया था—अगर किसी शादी में दो लोग भावनात्मक रूप से खुश नहीं हैं, तो उनके रिश्ते का भविष्य क्या हो सकता है?
इसी वजह से फिल्म को लेकर दर्शकों की राय अलग-अलग रही। 20 साल बाद भी फिल्म के रिश्तों, किरदारों और उसके संदेश को अलग-अलग नजरिए से देखा जाता है।
शाहरुख खान के लिए यह किरदार क्यों खास था?
शाहरुख खान की पहचान लंबे समय तक रोमांटिक और दर्शकों के पसंदीदा किरदारों से जुड़ी रही है। ऐसे में देव सरन जैसा गुस्सैल, निराश और कई कमियों वाला किरदार निभाना उनके लिए एक अलग तरह की चुनौती थी।
यही कारण है कि शूटिंग के दौरान उनका यह सवाल कि दर्शक उनके किरदार को पसंद कैसे करेंगे, फिल्म की सबसे दिलचस्प पर्दे के पीछे की कहानियों में से एक बन गया।
करण जौहर ने भी इस चुनौती को स्वीकार किया और देव को पूरी तरह ‘हीरो’ बनाने के बजाय उसकी कमजोरियों और गलतियों के साथ प्रस्तुत किया।
निष्कर्ष
‘कभी अलविदा ना कहना’ साल 2006 की उन फिल्मों में रही जिसने हिंदी सिनेमा में रिश्तों को लेकर एक अलग तरह की बातचीत शुरू की। फिल्म में शाहरुख खान और रानी मुखर्जी ने ऐसे किरदार निभाए जो पूरी तरह आदर्श नहीं थे और इसी वजह से कहानी को लेकर दर्शकों की राय भी अलग रही।
20 साल बाद करण जौहर की बातें यह बताती हैं कि फिल्म बनाते समय केवल निर्देशक ही नहीं, बल्कि शाहरुख खान भी अपने किरदार और दर्शकों की प्रतिक्रिया को लेकर चिंतित थे। आखिरकार फिल्म ने हिंदी सिनेमा में अपनी एक अलग पहचान बनाई और आज भी Kabhi Alvida Naa Kehna, Shah Rukh Khan और Karan Johar से जुड़ी चर्चाओं में इसका जिक्र होता है।





